हमारे लिए ऊर्जा के परम-स्रोत...

Sunday, 9 February 2014

पुस्तक समीक्षा




हिंदी ब्लॉग जगत में सुपरिचित डॉ. सुशील कुमार जोशी जी ने अपने विशिष्ट अंदाज़ में हमारी पुस्तक “शब्दों के पुल” पर अपने स्नेह-पुष्पों के रूप में कुछ स्वसृजित हाइकुओं की वर्षा की है । जहाँ तक मुझे याद पड़ता है मैंने पहले इनके हाइकु नहीं पढ़े हैं और यही इस समीक्षा की विशेषता कही जाएगी कि हाइकु की पुस्तक पर हाइकुओं द्वारा ही उन्होंने अपनी बात रखी है । हम उनके शुक्रगुज़ार हैं और हम उसे आप सभी मित्रों से यहाँ साझा कर रहे हैं :


जीवन और उससे जुड़े हुए हर पहलू को छूता है
“शब्दों के पुल”



डा. सारिका मुकेश की किताब ‘शब्दों के पुल’ हाथ में हैं । एक साधारण पाठक को समीक्षा करने का अवसर और एक सम्मान जो उन्होंने मुझे दिया है, उसके लिये मेरे पास शब्द नहीं हैं । लेखन मेरा शौक नहीं मजबूरी है। हाँ, ब्लॉग की भूल-भुलैय्या में भटकने की आदत जरूर है । अपने कृतित्व को पुस्तक का रुप दे पाना आसान नहीं होता है और सबसे महत्वपूर्ण है पाठक तक उसका पहुँचना । डा. सारिका मुकेश से मैं जितना परिचित हूँ उतने में ही मुझे उनका लेखन के प्रति झुकाव और असीम ऊर्जा का आभास हुआ । ‘शब्दों के पुल’ मे बहुत ही सुंदरता के साथ 112 पन्नों में 83 शीर्षकों के अंतर्गत तीन सौ दस हाईकू को एक माला की तरह पिरोया गया है। डा. सारिका मुकेश ने जीवन और उससे जुड़े हुऐ हर पहलू को छुआ है। हाईकू में पाँच-सात-पाँच अक्षरों की तीन लाईनों में बहुत खूबसूरती से जिस अंदाज में बहुत से पहलुओं को छूते हुए कवयित्री ने बहुत गहरी बातों को भी बहुत ही आसानी से कह दिया है, वो वाकई काबिले- तारीफ़ है । प्रतिभा भीड़ में से उसी तरह से निकल कर सामने आ जाती है जैसे दूध से मक्खन उसे ना टिप्पणियों की जरूरत होती है ना समीक्षा की । मैं कवि तो नहीं हूँ पर इतना जरूर कहना चाहूँगा:

सभी कुछ तो 

लिख दिया गया है 
बचा क्या है
       *


ऐसे ही कुछ 

लिखती चली जाना 
है अभिलाषा ।
       *


फिर-फिर से 

पढ़ना है जो लिखा
समझ गया

       *


शब्दों के पुल

बनाती चली गईं
फेविकोल से 
       *

आभार ले लो 
दिया है अवसर

सोचने का
       *



फिर-फिर पढ़कर नये-नये अर्थ समझता रहूँगा । इतना जरूर कहूँगा इस विधा के विद्यार्थियों के लिए इस तरह की पुस्तक पाठ्यक्रम में रखी जानी चाहियें । शुभकामनाओं के साथ,

डा. सुशील कुमार जोशी 
प्रोफेसर भौतिक रसायन विज्ञान 
कुमाऊँ विश्वविद्यालय
अल्मोड़ा-263601 (उत्तराखण्ड)

3 comments:

  1. बिल्कुल सही पहचाना आपने ! पहली बार लिख डाले हाईकू आपकी ही पुस्तक से प्रेरणा लेकर !

    ReplyDelete
    Replies
    1. अच्छे लगे आपके हाइकु :))
      अब आप अपनी पोस्ट में भी कभी-कभी हाइकु ज़रूर लिखें, देखिएगा यकीनन सबको पसंद आएंगे:-))

      Delete
  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (10-02-2014) को "चलो एक काम से तो पीछा छूटा... " (चर्चा मंच-1519) पर भी होगी!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    बसंतपंचमी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete

आपकी प्रतिक्रिया हमारा उत्साहवर्धन और मार्गदर्शन करेगी...